यात्रा
द्वन्द है.. प्रचंड सा ये आँधियों के संग है...
धधक धधक धधक रहा ये ज्वालाओं का तंज है
मृत्यु सा क्यों लग रहा ये उलझनों का मंच है
अंधकार घिर रहा.... श्याम घन से मिल रहा...
चीख़ता पुकारता.... है खड़ा स्तब्ध सा...
ख़्वाहिशों को भूलता.. है पत्थरों को चूमता..
है अखंड रास्ता या इसमें कोई मोड़ है....२
बेचैन सा है कर रहा ये किसका इतना शोर है....
टूटकर बिखर रहा... ये देखकर तू हंस रहा...??
मृत्यु है घृणित.., ये चीख़ कर है कह रही...
मृत पड़े इस मृत को मैं... मैं फिर से कैसे मार दूँ...
कमज़ोरियों की ख़ुद को जो दूसरों का हाथ दे..
अब चाहता है मुझसे ये की मैं भी इसको प्यार दूँ...
अब तू भी मुझसे चिढ़ रही...क्या तुझको मुझसे आस है...
ना उठ रहा ना बढ़ रहा... निराशा भी निराश है...
निराश हो ना युद्ध कर, चित्त फिर से शुद्ध कर,
प्रारम्भ को बिसारकर, विचार को तू बद्ध कर..
बेचैनियों के गर्त में, शनय शनय फिसल रहा,
ना कोई मेरे साथ है,ना उर में कोई आस है..
कठिनाइयों से डर गया, बस इतने में ही मर गया..??
कमज़ोरियों की फाँस ली,और मेरा काम कर गया...??
आँधियाँ तो आएँगी, तबहियाँ मचायेंगी..
वो अपना कर्म कर रहीं, तू अपने से मुकर रहा..
ये कृष्ण मेघ, आँधियाँ..पहाड़ को डिगाएँगी..??
हिम सा बन.. अटल सघन- मुश्किलों को चीर दे...
आना है मैं आऊँगी.. लेकर तुझको जाऊँगी...
इस तरह ना काम कर,
ख़ुद से हार मान कर,ना ऐसे तू अपमान कर..
क्या ग़ज़ब सा कर दिया,
ये कैसे इसको बल दिया
पग ये मेरे चल रहे, ये मुझसे आके लड़ रहे,
ये कैसी तुझमें बात है कि मृत्यु भी उदास है..
शर्म मुझको आ रही, ये दर्द मेरे खा रही,
ख़ुद से अब मैं लड़ रहा, कमज़ोरियों पे चढ़ रहा..
ना जल रहा... पिघल रहा... ना गश्त खा के गिर रहा
वज्र है वो शैल सा ना डिग रहा ना कप रहा....
है बादलों कि बीच से..एक रोशनी निकल रही...
उछल रही मचल रही.... ये मुझमे आके मिल रही....
इससे मैं प्रकाश लूँ... या इसको ही प्रकाश दूँ..
आरम्भ है- प्रारंभ है.. ना कोई ऐसा द्वन्द है..
उत्पत्ति भी है..अंत है.. इसको क्या मैं नाम दूँ,
सबल बना शरीर है अब इसको चल के काम दूँ..
-ऋषभतिवारी